हिन्दुत्व, मनुस्मृति और भारतीय संविधान – 2

मनुस्मृति के अनुसार अगर किसी ब्राह्मण को अन्य वर्णों द्वारा गाली दी जाती है तो क्षत्रिय और वैश्य पर आर्थिक जुर्माना ही लगाया जाएगा जबकि शूद्र को शारीरिक दंड देने की व्यवस्था की गई है। इसके लिए “वध” शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ हत्या करना होता है। लेकिन श्लोक का अनुवाद करने वालों ने उसे शारीरिक दंड में बदल दिया है ( शतं ब्राह्मण माक्रुश्य क्षत्रियो दंडमर्हति। वैशयोध्यर्धशत द्वै वा शूद्रस् तु वधमर्हति 8/267)।

शूद्र को शारीरिक दंड की व्यवस्था इसलिए की गई है क्योंकि वह ब्रह्मा के पैर से पैदा हुआ है। एक अन्य श्लोक में द्विज जातियों को गाली देने पर शूद्र की जीभ काट लेने की व्यवस्था है (8/270)। एक अन्य श्लोक के अनुसार यदि कोई शूद्र द्विज जाति के किसी व्यक्ति को जातिसूचक गाली देता है तो उसके मुँह में दस अंगुल के बराबर लंबी जलती हुई कील डाल देनी चाहिए (8/271)।

अगर कोई शूद्र ब्राह्मणों को उपदेश देने की कोशिश करे तो उसके मुँह और कान में गरम तेल डाल देना चाहिए (8/272)। अगर कोई शूद्र जिस- जिस अंग से द्विजजाति के व्यक्ति को प्रताड़ित करे उसके वे अंग कटवा देने चाहिए। हाथ या डंडा उठाकर मारे या पैर उठाकर मारे तो उसके हाथ और पैर काट देने चाहिए (8/279-80)। यदि कोई शूद्र द्विजजाति के साथ अभिमान से बैठने की चेष्टा करे तो उसकी कमर को गरम लोहे से दागकर उसे देश से निष्कासित कर दे (8/281)।

आगे के कई श्लोकों में शूद्रों के द्वारा किए जाने वाले कथित अपराधों के लिए अंगों को कटवाने की ही व्यवस्था की गई है जबकि इसी तरह के अपराध के लिए द्विजजाति के व्यक्ति को प्रायः आर्थिक दंड की ही व्यवस्था की गई है। यही नहीं शूद्र के
लिए दासकर्म को ही उपयुक्त बताया गया है। “खरीदे गए और न खरीदे गए शूद्र से दासकर्म करवाना चाहिए क्योंकि ब्रह्माजी ने उसे ब्राह्मण की दासता करने के लिए ही उत्पन्न किया है। स्वामी से मुक्त किया गया शूद्र भी दासकर्म से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि यह उसका स्वाभाविक धर्म है” (8/413-414)।

जिस तरह शूद्र के लिए दासत्व ही धर्म बताया गया है, स्त्री के लिए भी पराधीनता और दासत्व ही धर्म बताया गया है, चाहे वह किसी भी वर्ण की क्यों न हो। मनुस्मृति में कहा गया है कि पुरुषों को कभी अपनी स्त्रियों को स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए। विषयों में आसक्त स्त्रियों को सदैव अपने वश में रखना चाहिए। बचपन में स्त्री की रक्षा पिता करता है, युवावस्था में पति करता है और वृद्धावस्था में पुत्र करता है। स्त्री किसी भी अवस्था में स्वतंत्र रहने के योग्य नहीं होती (9/2-3)।

किसी भी आयु की स्त्री को, चाहे वह बालिका हो या युवती या वृद्धा उसे कोई भी काम, यहाँ तक कि घर के अंदर भी अपने मन से नहीं करना चाहिए ((5/147)। स्त्री को विद्या अध्ययन और यज्ञोपवीत आदि से रोका गया है। विवाह और पति सेवा को ही पर्याप्त समझा गया है। “विवाह की विधि ही स्त्रियों का वेदाध्ययनार्थक (उपनयनस्थानापन्न) संस्कार समझा गया है, उनकी पति सेवा ही गुरुकुलवास (गुरुकुलवासस्थानापन्न) है और उनका घर का काम करना ही अग्निपरिचरण है (2/67)।

मनुस्मृति स्त्री को धन रखने का अधिकार भी नहीं देता है। पत्नी, पुत्र और दास ये तीनों ही अपने धन से रहित होते हैं, वे जो धन प्राप्त करते हैं वह वे जिसके हैं उसी का होता है (8/416-417)। यह भी कहा गया है कि राजा को चाहिए कि वह वैश्य और शूद्र से बलपूर्वक काम कराए क्योंकि वे यदि अपने कार्य से विमुख हो जाते हैं तो वे इस जगत को विक्षुब्ध कर सकते हैं(8/418) यानी वहाँ अशान्ति फैल सकती है।

शूद्र और स्त्री को पराधीन रखना इसलिए जरूरी है ताकि उनसे शारीरिक श्रम कराया जा सके। जो श्रेष्ठ हैं वे इसलिए श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे शारीरिक श्रम नहीं करते और जो शारीरिक श्रम करता है वह तभी उसे करेगा जब उसे अन्य कामों को करने से रोका जाएगा। विद्याध्ययन से रोका जाना इसीलिए जरूरी है ताकि उनसे लगातार शारीरिक श्रम लिया जा सके।

प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी सद्गति में दलित दुखी पंडित घासीराम के पास अपनी बेटी की शादी का मुहूर्त निकलवाने जाता है और पंडित उसे लकड़ी फाड़ने की बेगार में लगा देता है और उस लकड़ी को फाड़ते हुए ही उसकी मौत हो जाती है। कहानी बताती है कि ब्राह्मण को लेकर उसके मन में किस तरह का भय है। वह ब्राह्मणों द्वारा शुभ और अशुभ मुहूर्त के अंधविश्वास में फंसे होने के कारण ही पंडित के पास जाता है और पंडित के आदेश का पालन न करने पर उसकी अवहेलना के दुष्परिणाम से भयभीत होकर वह बेगार करने के लिए तैयार हो जाता है।

दरअसल मनुस्मृति जैसे ग्रंथ जिनमें कही गयी बातों को ईश्वरीय आदेश कहा गया है, वास्तव में ब्राह्मणों द्वारा अपने ही पक्ष में रचे गए हैं ताकि लोगों को ईश्वर और धर्म का भय दिखाकर एक ऐसी व्यवस्था कायम की जा सके जो पूरी तरह उनके अधीन हो और प्रत्येक वर्ग उनकी इच्छा के अनुसार काम कर सके। ब्राह्मणवादी वर्णव्यवस्था ने जिस मानसिक गुलामी को पैदा किया है उसकी जकड़न को आज भी चारों और महसूस किया है।

और अब तो पिछले एक दशक से ज्यादा समय से एक ऐसी पार्टी सत्ता में है जिसके लिए मनुस्मृति हमेशा से आदर्श रही है। आरएसएस-भाजपा के सत्ता में रहने का ही परिणाम है कि दलितों पर अत्याचार बढ़ा है। आरक्षण की व्यवस्था को काफी हद तक कमजोर किया जा चुका है और अब मनरेगा को समाप्त कर गरीबों (जिनमें सबसे ज्यादा दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक ही हैं) को और अधिक गरीब और लाचार बनाये रखने की और कदम बढ़ा दिए गए हैं।

इस दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक सत्ता के कारण ही ब्राह्मणवादियों के हौसले इतने बुलंद है कि वे अपने फैसले में बेझिझक मनुस्मृति को उद्धृत करते हैं। आज जब संविधान दलितों को समानता का अधिकार देता है और शिक्षा और रोजगार में आरक्षण द्वारा अपनी स्थिति में सुधार कर सके तो सवर्ण जातियों का एक बाद हिस्सा आरक्षण का इसलिए भी विरोध करता है कि
अगर दलित बराबरी पर आ गए तो मेहनत-मजदूरी का काम कौन करेगा।

2014 में शिक्षित सवर्णों के बीच नरेंद्र मोदी के पक्ष में एक प्रचार यह भी था कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो देर-सवेर वे आरक्षण को जरूर खत्म कर देंगे, जैसाकि नजर भी आ रहा है। इस तरह ‘शूद्रों’ के लिए जो व्यवस्था मनुस्मृति में की गई है यानी द्विज जातियों की सेवा करने का वह व्यवस्था दुबारा कायम कर जगत में व्याप्त “विक्षुब्धता” को खत्म किया जा सकेगा।

गोलवलकर का मानना था कि सामाजिक तनाव जातिवाद के कारण नहीं बल्कि जातिवाद विरोधी अभियान ही वह जहर है जिसने राजनीतिक व्यवस्था को जहरीला बना दिया है। मनुस्मृति में जो लिखा गया है, वह केवल जातिवाद नहीं है, दरअसल यह ब्राह्मणवाद है। यहाँ विभिन्न वर्णों और जातियों में महज विभाजन ही नहीं है, उसमें अन्यों से अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को निकृष्ट मानने की बहुत गहरी भावना है। द्विज वर्णों में श्रेणीबद्धता और द्विज वर्णों का शूद्रों से अलगाव गुणात्मक रूप से अलग है।

शूद्र वर्ण नाम की सीढ़ी का सबसे निचला पायदान नहीं है, बल्कि उस सीढ़ी से अलग एक गहरा गड्ढा है जिससे बाहर निकलने का न उपाय है और न विकल्प है। उससे मुक्ति केवल एक ही स्थिति में हो सकती है कि इस पूरी वर्ण व्यवस्था को ठुकराकर
उससे किसी तरह का संबंध न रखा जाये।

यह तभी संभव है जब हिन्दू धर्म से ही नाता तोड़ लिया जाए जैसाकि बाबा साहिब अंबेडकर ने किया था कि हम ऐसे किसी धर्म को अपना लें जिसमें वर्णव्यवस्था और जातिवाद न हो और जो धर्म अपने ही समुदाय के बीच किसी तरह का भेदभाव न करता हो या ईश्वर और धर्म को पूरी तरह त्यागकर नास्तिक बना जाए।

यह इसलिए जरूरी है क्योंकि वर्णव्यवस्था में विश्वास हमें मनुष्य ही नहीं रहने देता। वह हमारे विवेक को छीन लेता है। हम इतने अंधे हो जाते हैं कि गाय की तो पूजा करते हैं, उसके मूत्र को पीना भी अपना धर्म समझते हैं और अपने ही भाइयों को शूद्र मानकर उनसे अपने को बहुत ऊंचा समझते हैं, उनसे दूर रहते हैं। उनका छुआ नहीं खाते और उनके साथ किसी भी तरह का बराबरी का व्यवहार करने में अपनी हेठी समझते हैं।

ऐसे ग्रंथ को कोई भी विवेकवान व्यक्ति जिसका मनुष्यता में थोड़ा भी यकीन हो कैसे स्वीकार कर सकता है और उसका महान ग्रंथ कह सकता है। सिर्फ वही व्यक्ति ऐसा कह सकता है जिसका खुद का यकीन वर्णव्यवस्था और ब्रह्मणवाद में हो।

आज से 98 साल पहले बाबा साहिब अंबेडकर ने 25 दिसम्बर 1927 के दिन महाड़ सत्याग्रह के दौरान एक ऐसे कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, जहां मनुस्मृति की एक प्रति जलाई गई थी और ये आह्वान किया था कि हर साल इस दिन को ‘मनुस्मृति दहन’ के रूप में मनाया जाना चाहिए (शम्सुल इस्लाम की पुस्तक ‘गोलवलकर की हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा : एक आलोचनात्मक समीक्षा’ से उद्धृत, पृष्ठ 92)।

लेकिन हिन्दुत्व को अपनी विचारधारा मानने वाले आज भी मनुस्मृति के प्रति केवल श्रद्धा नहीं रखते बल्कि संविधान को हटाकर मनुस्मृति को लागू करना चाहते हैं। वैसे भी संविधान को काफी हद तक नकारा बनाया जा चुका है। आरएसएस के वैचारिक पथप्रदर्शक और हिन्दुत्व के सिद्धांतकार विनायक दामोदर सावरकर जो स्वयं जाति से ब्राह्मण थे, मनुस्मृति को एक महान ग्रंथ मानते थे।

उन्हीं के शब्दों में, “मनुस्मृति एक पवित्र पुस्तक है, जो वेदों के बाद हिन्दू राष्ट्र में सर्वाधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति, रीतिरिवाजों, हमारे विचारों तथा कर्मों का आधार बन गयी। सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक और दैवीय पाठ के लिए दिशानिर्देश निर्मित किये हैं।

आज भी करोड़ों हिन्दू अपने जीवन और क्रियाकलाप में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर ही आधारित हैं। आज मनुस्मृति ही हिन्दू कानून है। यह बुनियादी बात है (सावरकर समग्र खंड 4, पृष्ठ 416 पर संकलित लेख ‘मनुस्मृति में महिलायें’, शम्सुल इस्लाम की पुस्तक ‘गोलवलकर की हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा : एक आलोचनात्मक समीक्षा’ से उद्धृत, पृष्ठ 92)।

26 नवंबर 1949 के दिन भारतीय संविधान को स्वीकृति दी गयी थी, उसके चार दिन बाद 30 नवंबर को आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गेनाइजर के संपादकीय में लिखा गया था कि “लेकिन हमारे संविधान प्राचीन भारत के अनूठे संवैधानिक विकास का कोई जिक्र नहीं है। मनु के कानून सपरता के लिकारगस या पर्सिया के सोलन से पहले लिखे गए हैं।

मनुस्मृति में कहे गए कानून आज तक दुनिया भर में प्रशंसा का भाव जगाते हैं, स्वीकार करने हेतु विवश करते हैं और लोग उस पर मोहर लगाते हैं। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है” (शम्सुल इस्लाम की पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 91)।

आरएसएस ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि मनुस्मृति में न्याय और दंड संबंधी व्यवस्थाओं को स्वीकार कर लिया जाए। जब 26 जनवरी 1950 को भारत लोकतान्त्रिक गणतंत्र घोषित किया गया तब एक बार फिर उसी ऑर्गेनाइजर में शंकर सुब्बा अय्यर जो हाई कोर्ट के सेवनिवृत न्यायाधीश थे, का एक लेख प्रकाशित किया गया।

न्यायाधीश महोदय ने इस आलेख में लिखा था : “इसके बावजूद कि पिछले दिनों डॉ अंबेडकर के मुंबई में यह कहने की खबर है कि मनु के दिन लद गए, यह एक तथ्य है कि आज भी हिंदुओं का दैनिक जीवन मनुस्मृति तथा अन्य स्मृतियों के सिद्धांतों और आदेशों से प्रभावित होता है।

यहाँ तक कि एक उदार हिन्दू भी कुछ मामलों में खुद को स्मृतियों में अंतर्निहित नियमों से बंधा हुआ पाता है और उनसे अपने जुड़ाव को पूरी तरह त्याग देने पर शक्तिहीन महसूस करता है” (6 फरवरी 1950 के ऑर्गनाइजेर में प्रकाशित आलेख ‘मनु रुल्स अवर हार्ट्स’, (शम्सुल इस्लाम की पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 91)।

न्यायाधीश अय्यर के कथन में इतनी सच्चाई जरूर है कि “आज के हिंदुओं का दैनिक जीवन मनुस्मृति तथा अन्य स्मृतियों में अंतर्निहित नियमों से बंधा” हुआ है, लेकिन सवर्ण जो इन नियमों से बांधकर अपने को शक्तिवान समझता है और दलितों और स्त्रियों का उत्पीड़न करने की ताकत हासिल करता है, मनुस्मृति के नियम कायदों को त्याग देने पर वह अपने को “शक्तिहीन महसूस करता है।”

स्पष्ट है कि न्यायाधीश की कलम से जो सच्चाई निकली है, वह यह है कि मनुस्मृति की जगह संविधान के लागू होने से सवर्ण और
अवर्ण में कोई फर्क नहीं होगा। मनुस्मृति ने जो अत्याचार करने के विशेषाधिकार दिए हैं, वे खत्म हो जाएंगे और वे और अन्य संविधान के प्रावधानों के समक्ष बराबर होंगे यही उनका दुख है और इसीलिए वे मनुस्मृति को भूल नहीं पाते और बारबार उसकी कथित महानता को याद करते रहते हैं। मनुस्मृति बुनियादी तौर पर समानता विरोधी ग्रंथ है।

यह महज शब्दों का खेल नहीं है कि आरएसएस हमेशा समानता की नहीं बल्कि समरसता की बात करता है यानी समानता की जगह समरसता का अर्थ है जो इस वर्णव्यवस्था में जिस पायदान पर है और जिसे जो काम सौंपा गया है, उसे करते हुए प्रसन्न रहे और समाज में शांति बनाए रखे क्योंकि यह व्यवस्था मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं है बल्कि दैवीय है और हम इस दैवीय विधान से बंधे हुए हैं।

ईश्वर का डर दिखाकर एक बर्बर, क्रूर और हिंसक व्यवस्था को कैसे स्वीकार किया जा सकता है और ऐसी व्यवस्था के समर्थक ग्रंथ और उसका समर्थन करने वाले संगठन और लोग एक लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समतावादी देश में कैसे स्वीकार्य हो सकते हैं। भारत का संविधान जिन मूल्यों पर आधारित है, वह हर दृष्टि से मनुस्मृति के नकार पर आधारित है।

भारतीय संविधान अपने नागरिकों को अपने-अपने धर्म मानने की स्वतंत्रता तो देता है लेकिन धर्म के नाम पर मनुस्मृति में कही गई बातों को पालन करने की स्वतंत्रता नहीं देता क्योंकि संविधान की बुनियाद जिन मानवमूल्यों पर टिकी है उसकी सीधा टकराव मनुस्मृति से है। मनुस्मृति को ठुकराकर ही संविधान में आस्था रखी जा सकती है। हमारा संविधान मनुस्मृति के कथित राजधर्म और दंडव्यवस्था के विपरीत मूल्यों पर आधारित है, उस मनुस्मृति को अदालतें समय-समय पर उद्धृत करती रहती है।

जब संविधान को लागू किया जा रहा था तब भारत में ऐसी राजनीतिक ताकतें थीं जो मनुस्मृति को लागू करने की हिमायत कर रहे थे। यही नहीं जयपुर के उच्च न्यायालय के प्रांगण में मनु की मूर्ति स्थापित की हुई है, जिसको हटाने की कई बार मांग की जा चुकी है, लेकिन किसी सरकार में यह साहस नहीं है कि मनु की मूर्ति को वहाँ से हटा सके।

जिस संविधान के अंतर्गत भारत धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र बना, उसमें सर्वोच्च सत्ता स्वयं भारत की जनता थी जिसने अपने को यह संविधान प्रदान किया था। संविधान की नज़र में प्रत्येक भारतीय नागरिक चाहे उसका धर्म, उसकी जाति, उसकी नस्ल, उसकी भाषा कुछ भी क्यों न हो, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष या वह हिंदुस्तान के किसी भी इलाके का रहने वाला क्यों न हो, सब बराबर हैं और सबको समान अधिकार हासिल हैं।

स्वतंत्रता, समानता और पारस्परिक भाईचारे के सिद्धांत पर इस लोकतांत्रिक गणतंत्र की नींव रखी गयी थी, जिसकी सबसे बड़ी पहचान धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावादी संस्कृति थी। स्पष्ट है कि भारतीय संविधान उन आधुनिक मानव-मूल्यों पर आधारित है जिसकी शुरुआत फ्रांसीसी क्रांति (1789-1799) से हुई थी। इस क्रांति ने राजतन्त्र को खत्म कर गणतंत्र की स्थापना की और स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को जन्म दिया।

संविधान पर फ्रांसीसी क्रांति से लेकर सोवियत संघ की बोलशेविक क्रांति के असर को देखा जा सकता है। एक मध्ययुगीन ग्रंथ जो संविधान के मूल्यों के विपरीत हैं, वह हमारा आदर्श नहीं हो सकता। लेकिन आरएसएस-भाजपा के लिए वह आदर्श है जो इस संप्रभुतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र को हिन्दू राष्ट्र में बदलना चाहता है और यह तभी संभव है जब हमारे संविधान को हटाकर मनुस्मृति को लागू करे।

बाबा साहब अंबेडकर ने भविष्य के इस खतरे को भांप लिया था जो आज हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। इसीलिए उन्होंने लिखा था, “यदि हिन्दू राज एक दिन वास्तविकता बनता है तो निस्संदेह वह इस देश के लिए बहुत बड़ी आपदा होगी। किसी भी कीमत पर हिन्दू राज को बनने से रोका जाना चाहिए” (पाकिस्तान या भारत का विभाजन, 1946, 354-55)।
संदर्भ ग्रंथ
-मनुस्मृति: सम्पादन और अनुवाद : शिवराज आचार्य, 2008, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी।
-गोलवलकर की हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा : एक आलोचनात्मक समीक्षा : शम्सुल इस्लाम, अनुवाद: अशोक कुमार पांडे, 2020, फारोस मीडिया, नयी दिल्ली।
-The RSS : A menace to India : A.G. Noorani, 2019, Leftword, New Delhi.
-Bunch of thoughts : M.S. Golwalkar, 2025, Global Academic Publishers and
Distributors, New Delhi

(जवरीमल्ल पारख लेखक, फिल्म समीक्षक और कथाकार हैं।)

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